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सत्ता की डगर : सियासत में नए समीकरण बना सकता है लखीमपुर खीरी!

लखीमपुर की घटना के मद्देनजर प्रदेश में नए राजनीतिक समीकरण बनने लगें तो ताज्जुब की बात नहीं है। इस मुद्दे पर जिस तरह से कांग्रेस ने विरोधी दलों पर बढ़त बनाई, उसने भाजपा से अलग-अलग मुकाबिल विपक्ष को इस पार्टी के बारे में सोचने को मजबूर कर दिया है, जो अभी तक प्रदेश में इस पार्टी को हाशिए और सियासी तौर पर अप्रसांगिक मानते थे। इसके बावजूद विपक्ष के सामने भाजपा विरोधी वोटों के ज्यादा बंटवारे का संकट जरूर खड़ा होता दिख रहा है। ऐसे में ओमप्रकाश राजभर, ओवैसी और शिवपाल जैसे अन्य नेताओं को भी नए सिरे से रणनीति का तानाबाना बुनना पड़ सकता है। अब बात भाजपा की, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की लखीमपुर मामले में त्वरित कार्रवाई से ज्यादा सियासी नुकसान की आशंका टलती दिख रही है। मगर बदले घटनाक्रम व समीकरण प्रदेश में विपक्ष की नई सियासी गोलबंदी का कारण जरूर बन सकते हैं। हालांकि पूर्व में कई तरह के गठबंधनों पर भाजपा का समग्र हिंदुत्व का फैक्टर भारी पड़ा है। विधानसभा चुनाव नजदीक है। ऐसे में विपक्ष की कोशिश इस मुद्दे को लगातार गरमाए रखने की होगी। इसके चलते भाजपा के सामने पहले की तुलना में कुछ चुनौती तो आकर खड़ी हो ही गई है। ...इसलिए सियासी तौर पर महत्वपूर्ण राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पूर्व की घटनाएं और लखीमपुर की घटना में बारीक, मगर बड़ा अंतर है। इस घटना में किसान जैसे बड़े वर्ग के होने से विपक्ष को इसके सहारे यूपी के साथ दूसरे राज्यों में भी भाजपा के खिलाफ अपनी उम्मीद दिखना स्वाभाविक है, जहां इस वर्ष चुनाव है। भाजपा ने इस मुद्दे पर विपक्ष पर वोट के लिए लोगों की संवेदनाओं पर सियासत करने का आरोप लगाया है। भाजपा विरोधियों का खेल बिगाड़ सकती कांग्रेस विपक्ष को लखीमपुर की घटना में सियासी उम्मीदें दिख रही हैं। पर, सपा ने किसी बड़े दल से कोई गठबंधन न करने और छोटे दलों को साथ लेने, जबकि बसपा ने अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा की है। हालांकि अखिलेश यादव ने किसी बड़े दल से गठबंधन न करने की घोषणा तब की थी, जब प्रियंका गांधी ने यूपी में गठबंधन की संभावनाएं खुले होने की बात कही थी। तब परिस्थितियां दूसरी थीं, अब लखीमपुर के चलते बदली हैं। पूरे मामले में कांग्रेस जिस तरह से विपक्षी दलों के बीच बाजी मारती दिखी है, उसके चलते भाजपा विरोधी दलों को भी उसके बारे में सोचना लाजिमी हो गया है। क्योंकि प्रियंका के तेवरों ने कांग्रेस को गांवों तक चर्चा व सियासी फोकस में ला दिया है। यह फोकस उसके पक्ष में पड़ने वाले वोटों में कितना तब्दील होगा, इस पर कोई दावा नहीं हो सकता है। हालांकि कांग्रेस ने अपने नेताओं को लगातार इस मुद्दे पर सक्रिय कर रखा है। यानी अभी इसे गरमाए रहेगी। ऐसे में सपा व बसपा के लिए कांग्रेस की अनदेखी अब पहले जैसी आसान नहीं दिख रही है। कांग्रेस कुछ और कर पाए या नहीं, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में वह भाजपा विरोधियों का खेल बिगाड़ जरूर सकती है। सपा-बसपा को कांग्रेस के बारे में पड़ेगा सोचना राजनीतिशास्त्री प्रो. एसके द्विवेदी भी कहते हैं कि विपक्षी दलों को पता है कि वे अकेले भाजपा का मुकाबला नहीं कर सकते हैं। इसके बावजूद सपा मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण से खुद के लिए उम्मीदें देख रही थी, लेकिन अब उसे और बसपा दोनों को कांग्रेस के बारे में सोचना पड़ेगा। वहीं इस संभावना की तरफ से आंखें नहीं बंद करनी चाहिए कि प्रदेश में सक्रिय छोटे दलों के अलावा राजभर व शिवपाल भी सपा की कठिनाई बढ़ा सकते हैं। इसके बावजूद भाजपा के खिलाफ गोलबंदी में मुख्यमंत्री की कुर्सी और नेतृत्व पर सहमति विपक्ष के नेताओं की बड़ी चुनौती है। अब प्रदेश में बारगेनिंग की स्थिति में कांग्रेस लखीमपुर में प्रियंका गांधी का एक्शन हाथरस से लेकर उभ्भा तक जैसा ही था। पर, इस बार विपक्ष के दूसरे दल उनसे पीछे रह गए। लखीमपुर कूच के एलान पर अमल को दूसरे दल जहां सुबह का इंतजार ही करते रहे, वहीं प्रियंका घटना वाली रात ही लखनऊ से लखीमपुर खीरी जाने वाली सड़क पर सीतापुर से पहले प्रशासन से भिड़ती नजर आईं। तो रही-सही कसर उनकी गिरफ्तारी ने पूरी कर दी। नतीजा यह हुआ कि अगले दिन सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव को जोरदार प्रदर्शन व गिरफ्तारी, बसपा के राष्ट्रीय महासचिव सतीश मिश्र का एलान व स्थगन और प्रसपा प्रमुख शिवपाल सिंह यादव का प्रदर्शन व तेवर के साथ गिरफ्तारी भी प्रियंका की चर्चा को दबा नहीं पाए। कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ व पंजाब के मुख्यमंत्रियों सहित सचिन पायलट जैसे नेताओं को लखीमपुर भेजने के फैसले से भी लोगों का ध्यान अपनी तरफ बढ़ा दिया। वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप कपूर भी कहते हैं कि प्रियंका गांधी की सक्रियता से तुरंत किसी बड़े परिवर्तन का दावा करना ठीक नहीं है, लेकिन उन्होंने उस कांग्रेस को यूपी में फोकस में लाकर बारगेनिंग की स्थिति में खड़ा कर दिया, जिसको पूछना भी अभी कोई जरूरी नहीं समझता था। इससे पार्टी में बिखराव पर भी विराम लग सकता है।

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